| Jan 01, 1970 | Daily Report |
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20711. Organic Farmer Makes Lakhs Growing Fruit in Drought-Prone Beed, Inspires 50 Others
Contribution of SOCIETY to “Make in India” Self-employment (Atmanibhar)
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- This Beed farmer switched to organic farming after attending a seminar. He made a fortune growing organic papaya and watermelon.
- However, a farmer in Parali taluka of Beed district, a perennially drought-stricken area of the Marathwada region in Maharashtra, chose to break tradition and has become quite successful pioneer.“I used to cultivate soybean, grams and other arid crops common to the region. However, a guiding session on organic farming and its success on fruit crops convinced me to try growing papaya on one acre of land,” says Sandip Gite, a farmer in Nandagoul village.
- Sandip said organic techniques required less water and were a more natural or method of farming.“The investment costs came down and also crop management became easier,” he adds.The farmer said in seven months of the harvest, he earned Rs 3 Lakh from the crop
20712. गुरुग्राम: जॉब छोड़कर घर से शुरू किया बेकरी बिज़नेस, अब प्रतिदिन कमातीं हैं 10 हज़ार रूपये
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- सोशल मीडिया के जमाने में दुनिया अपनी मुट्ठी में हो गई है। ऐसे में घर से बिजनेस शुरू करना बहुत आसान हो गया है। लेकिन कुछ पल थमकर जरा उस वक्त के बारे में सोचिए और कल्पना कीजिए जब सोशल मीडिया नहीं था। उस वक्त आपके काम को लाइक और शेयर करने वाला कोई नेटवर्क मौजूद नहीं था। ऐसे ही दौर में गुरुग्राम की रहने वाली इला प्रकाश सिंह ने अपनी बेकरी का काम शुरू किया था।
- इला ने लगभग 5,000 रुपये के निवेश से अपना बिजनेश शुरू किया था और आज वह करीब 10,000 रुपये हर दिन कमाती हैं। आज वह केक, कुकीज, चॉकलेट्स, ग्लूटेन फ्री ब्रेड, डेसर्ट, आर्टिसनल ब्रेड जैसे बेकरी प्रोडक्ट की 40 से अधिक किस्में समेत अन्य स्वादिष्ट आइटम जैसे पैटी, स्टफ्ड बन्स, पिज्जा और गिफ्ट हैम्पर की पूरे एनसीआर में डिलीवरी करती हैं।
- इला कहती हैं, “जब मैंने बिजनेस शुरु किया तो पहले से कोई मेन्यू निर्धारित नहीं था और न ही कोई योजना थी। मैंने खुद ही पोस्टर बनाया और काम शुरू कर दिया। मैं विंडसर मैनर शेरेटन में अपने काम के दिनों के दौरान जो रेसिपीज़ बनाती थी, इसी से मैंने शुरूआत की। अपने अपार्टमेंट कॉम्पलेक्स के चारों ओर जाती थी और उस पर अपने कॉन्टैक्ट डिटेल के साथ विज्ञापन चिपकाती थी।”
20713. Https://hindi.thebetterindia.com/49865/gujrat-farmer-earns-lakhs-with-zero-budget-farming-cancer-healthy-food-farming/
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Agriculture(Organic Farming)
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- सूरत के रामचंद्र पटेल की जीरो बजट नैचुरल फॉर्मिंग तकनीक से खेती में इनपुट लागत काफी कम हुई और उन्हें रिटर्न को बढ़ाने में मदद मिली। हर साल उन्हें एक एकड़ भूमि से डेढ़ लाख रुपए और 18 एकड़ से 27 लाख रुपये का मुनाफा होता है।
- रामचंद्र, मुंबई के अस्पताल में लगभग 13 बार गए और तब जाकर उन्हें डॉक्टरों से अपने पिता की बीमारी का कारण पता चला। उन्हें पता चला कि अच्छी उपज के लिए फसलों पर रसायन और हानिकारक कीटनाशक के छिड़काव के कारण वह कैंसर की चपेट में आए।यह सुनकर रामचंद्र की आंखें खुल गई। उनके पिता ने कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी के कारण दम तोड़ दिया लेकिन रामचंद्र ने रासायनिक खेती छोड़कर प्राकृतिक तरीके से खेती करने का फैसला किया। 1991 से उन्होंने गैर-कृषि भूमि के एक प्लॉट पर जीरो बजट नैचुरल फॉर्मिंग (ZBNF) अपनाते हुए काम करना शुरू किया और इसे एक उपजाऊ जमीन में बदल दिया।
- रामचंद्र ने द बेटर इंडिया को बताया, “मेरी इनपुट लागत शून्य है। मेरे खेत की मिट्टी काफी उपजाऊ है। जिसमें अधिक पैदावार होती है और मुनाफा भी अधिक होता है। सच कहूँ तो अब मेरा इम्युनिटी सिस्टम पहले से बेहतर हुआ है और अब मैं अपने ग्राहकों को जहर नहीं खिला रहा हूँ।”
20714. दिल्ली: व्हीलचेयर पर बैठे-बैठे फूलों का सफल व्यवसाय चलातीं हैं यह 80 वर्षीया दादी
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- “लॉकडाउन के पहले ही महीने से मुझे ग्राहकों के फोन आने लगे, उनमें से कुछ लोगों ने बताया कि उदासी भरे समय में फूल ही उन्हें खुशी देते हैं। लोगों के कॉल से मैं काफी उत्साहित हुई और मैंने अपने ग्राहकों को फूल बेचने के साथ ही डिलीवरी सर्विस देनी भी शुरू कर दी।” -स्वदेश चड्ढा
- हर हफ्ते रानी Delhi-NCR के कई घरों में लगभग 100 गुच्छे फूल भेजती हैं और यह संख्या लगातार बढ़ रही है।
- अक्टूबर 2019 में गुरुग्राम के होराइजन प्लाजा में लगने वाले साप्ताहिक बाज़ार में उनका पहला फ्लावर स्टॉल लगा। जिसमें रानी अपने छोटे मनीबॉक्स के साथ बैठीं। वह ग्राहकों से बातचीत कर रही थीं और पौधों को लंबे समय तक मेंटेन रखने के लिए उन्हें छोटे-छोटे टिप्स दे रही थी।
20715. 1 एकड़ तालाब में मोती की खेती से कमा सकते हैं 5 लाख रूपए, समझें बिहार के इस किसान का मॉडल
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Agriculture(Organic Farming)
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- 2009 में बिहार के जयशंकर ने 1 बीघा जमीन में 5 फीट गहरा और 15 फीट की मिट्टी की बाउंड्री वाला एक तालाब खोदा। कम से कम 5,000 मसल्स वाले तालाब से सालाना दर्जनों बाल्टी-मोती मिलते हैं। समझिये इनका मॉडल।
- `बेगूसराय के तेतरी गाँव में पले-बढ़े जयशंकर ने 1.5 बीघा जमीन में इकोलॉजिकल खेती का एक अनोखा सिंबायोटिक मॉडल तैयार किया है। इसमें मोती की खेती और मछली पकड़ने के साथ जैविक सब्जी, फल,औषधीय जड़ी बूटियों का वर्टिकल गार्डन, पोल्ट्री, वर्मीकम्पोस्ट और बायोगैस का उत्पादन किया जाता है।
- भुवनेश्वर स्थित इंडियन काउंसिल फॉर एग्रीकल्चर रिसर्च-सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ फ्रेशवाटर एक्वाकल्चर (ICAR-CIFA) के योगदान के बारे में जानने के बाद वह सहायता के लिए उनके पास पहुँचे। मोती की खेती में वहाँ के अनुभवी वैज्ञानिकों ने इस प्रक्रिया के माध्यम से उनका मार्गदर्शन किया और जरूरी ट्रेनिंग भी दी।
20716. खेती के लिए छोड़ी अमेरिका में नौकरी, अब बड़े-बड़े होटलों में जाते हैं इनके उत्पाद
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Agriculture(Organic Farming)
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- गायत्री ने महाराष्ट्र में जैविक खेती शुरू करने के लिए 10 साल पहले अमेरिका में नौकरी छोड़ दी। अब वे अपने 10 एकड़ जमीन पर फलों और सब्जियों से लेकर, औषधीय पौधों की भी खेती करती हैं।
- लगभग एक दशक पहले, गायत्री बोस्टन स्थित पर्यावरण संरक्षण एजेंसी में बतौर पर्यावरण विश्लेषक काम कर रही थी। अमेरिका छोड़ने के बाद जब वह पहली बार अपने फार्म ‘वृंदावन’ आईं, तो यहाँ मुख्यतः एक आम का बाग था, जिसमें सात किस्मों के 500 पेड़ लगे थे। साथ ही कुछ नारियल, काजू और काली मिर्च भी लगे थे।
- लेकिन आज इस फार्म में आपको अलग-अलग प्रजाति के ढेर सारे आम के पेड़, केला, पपीता, शहतूत, चीकू, अनानास, कटहल, जंगली जामुन आदि के पेड़ दिखेंगे। साथ ही गायत्री मसाले और सब्जी की भी खेती कर रही हैं। हल्दी, अदरक से लेकर काली मिर्च तक वह उगा रही हैं। सब्जी की बात करें तो इस फार्म में कद्दू, टमाटर, बैंगन, आदि की भी खेती हो रही है।
20717. वैशाली प्रिया ने बिहार के हरिहरपुर गांव की महिलाओं को केले के तने से कपड़ा बनाना सिखाया, अपने प्रोजेक्ट के जरिये लोगों को दिए रोजगार के अवसर
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- अपनी टेक्सटाइल डिजाइनिंग में वैशाली ने कपड़े का सही उपयोग कर कई लोगों को रोजगार के अवसर दिए हैं
- वैशाली ने 'सुरमई बनाना एक्सट्रेक्शन प्रोजेक्ट लॉन्च' किया है। अपने प्रोजेक्ट के माध्यम से वे ग्रामीण महिलाओं को ऑर्गेनिक और नैचुरल फाइबर प्रोडक्ट बनाना सिखाती हैं
- वैशाली कहती हैं ''इस प्रोजेक्ट से होने वाले मुनाफे को देखते हुए इससे और लोग भी जुड़ते जा रहे हैं। यहां महिलाओं को कपड़ा बनाने से जुड़ी कई बारीकियां जैसे कपड़े को भिगोना, बुनना और उसकी प्रोसेसिंग आदि सिखाई जाती है''।
20718. तीन साल पहले कपड़ों का ऑनलाइन बिजनेस शुरू किया, कोरोना आया तो लॉन्च की पीपीई किट, 5 करोड़ रु पहुंचा टर्नओवर
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- दिल्ली की वंशिका ने 2017 में बिजनेस शुरू किया था, आज 200 से ज्यादा होटल्स, स्कूल और रेस्टोरेंट के लिए यूनिफॉर्म तैयार करती हैं, उनके साथ 200 से ज्यादा लोग जुड़े हैं
- दिसंबर 2019 में शादी के बाद वंशिका मुंबई शिफ्ट हो गईं, अभी मुंबई और गुजरात में उनकी कंपनी काम कर रही है
- वंशिका बताती हैं कि लॉकडाउन के दौरान पीपीई किट तैयार करने और उसकी सप्लाई करने में काफी दिक्कत हुई। तब न तो कहीं दुकानें खुलीं थी न ही कोई मजदूर काम करने को तैयार था। एक पॉली बैग के लिए भी कड़ी मशक्कत करनी पड़ती थी।
20719. इंजीनियरिंग की नौकरी छोड़ घर के गैरेज से ऑनलाइन बेचने लगीं मसाले, 20 लाख रु टर्नओवर, अमेरिका-कनाडा से भी मिले ऑर्डर
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- उनके प्रोडक्ट 100 फीसदी नैचुरल होते हैं, हर चीज घर की इस्तेमाल करते हैं, मसालों के लिए सामान भी गांव से मंगाते हैं ताकि मिलावट नहीं हो
- स्नेहा की कंपनी में 7 लोग काम करते हैं, हर महीने 1000 प्रोडक्ट सेल होते हैं, 50 से ज्यादा टाइप के प्रोडक्ट वे लोग तैयार करते हैं
- स्नेहा बताती हैं कि हमारे प्रोडक्ट 100 फीसदी नेचुरल होते हैं। हम हर चीज घर की इस्तेमाल करते हैं। मसालों के लिए रॉ मटेरियल भी गांव से मंगाते हैं ताकि कहीं से कुछ भी मिलावट नहीं हो। हम लोग इन मसालों में कोई केमिकल या प्रिजर्वेटिव्स भी ऐड नहीं करते हैं। यही हमारा यूएसपी है, जिसे लोग पसंद करते हैं।
20720. पार्किंग शेड में मशरूम उगाकर 2 लाख कमातीं हैं गुजरात की यह इंजीनियर, जानिए कैसे!
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- सिविल इंजीनियर अंजना गामित कहती हैं कि यदि आपको कभी भी अपने घर या बैकयार्ड में खेती करने का विचार आए तो ऑर्गेनिक ऑइस्टर (सीप) मशरूम के विकल्प को चुनें, क्योंकि इसमें कम निवेश में लाभ अधिक है।
- अंजना पिछले 3 वर्षों से मशरूम की खेती कर रही हैं और उन्होंने पिछले साल 2 लाख रुपए से अधिक का मुनाफा कमाया था। सिर्फ इतना ही नहीं, अपने क्षेत्र में इस प्रोटीन युक्त उत्पाद की मांग न होने के बावजूद, वह अपने संभावित खरीदारों का बाजार बनाने में कामयाब रहीं।
- कुछ साल पहले अंजना ने, कृषि विज्ञान केंद्र (KVK) द्वारा आयोजित एक चार दिवसीय कार्यक्रम ‘मशरूम खेती के माध्यम से उद्यमिता विकास’ में हिस्सा लिया था। वहाँ से वापसी के दौरान, उन्हें कुछ स्पॉन (मशरूम के बीज) और पॉलिथीन के बैग मिले थे। इसके बाद, कृषि विज्ञान केंद्र के विशेषज्ञों ने अंजना को मशरूम की खेती के लिए सेटअप तैयार करने में मदद करने के साथ ही, शुरुआती दिनों में जरूरी तकनीकि मार्गदर्शन भी किया।